Friday, 5 October 2018

वो तेरा राजमा चावल..

वो तेरा राजमा चावल, नहीं था खास जिसका स्वाद,
हटाया गाल से तेरे, इसलिए आज तक है याद,
वो तेरी चैन साइकिल की, नहीं करने की कोई बात
फंसी कुछ इसतरह चुनरी, रह गया आज तक जो याद
कैमिस्टी की वो कोचिंग क्लास, दिलो मे कैद जिसकी याद,
तूझे गाने की सूरत मे, जब कहा चौदहवीं का चांद

रात भर भीगता रहा..

रात भर भीगता रहा, तेरी यादों की बारिश मे,
झरोखा उन दिनों का कल, खुला गलती से रह गया
बताया दिल को सौ सौ बार, नहीं बच्चा रहा अब तू,
मगर बच्चा करें क्या जो, बडा गलती से हो गया

वो गलियाँ छोड आया हूँ, भरम कई बार ये टूटा,
कहीं यादों का टुकड़ा जो, बचा गलती से रह गया
जला लेतें हैं अपने को, दबी सी आग के धोखे,
बुझी राखो मे शोला जो, छिपा गलती से रह गया

तेरी बातें कहेंगे सुनेंगे, ठान बैठे थे,
नहीं रोका गया वो जिक्र, जो गलती से हो गया ।।
हर एक तस्वीर को तेरी, मिटा पूरी तरह डाला,
मगर चेहरा तेरा दिल पे, छपा गलती से रह गया ।।
छपा दिल पे तेरे चेहरे का तिल, गलती से रह गया।।(FB)

उठ जाओ रोना बंद करो, रोने से क्या हासिल होगा...


कोई रूठ गया, कोई छूट गया
कुछ टूट गया, कोई लूट गया
रिसते घावों को गिनने,  अब क्या दिल होगा
उठ जाओ रोना बंद करो, रोने से क्या हासिल होगा।

कहीं हार हुयी, कई बार हुयीं
कुछ भूल हुयीं, प्रतिकूल हुयीं
गिर गिर फिर उठने से ही तो, तू चलने के काबिल होगा
उठ जाओ रोना बंद करो, रोने से क्या हासिल होगा।

कभी छति हुयीं, जो अति हुयीं
कुछ डूब गया, सम्पूर्ण गया
पतवार छोड़ के रखने से, क्या पास कभी साहिल होगा
उठ जाओ रोना बंद करो, रोने से क्या हासिल होगा।

जो चाहे है, तो राहें हैं
जो बाकी है, वो काफी हैं
सोया विश्वास जगाने से, तू फिर अपनी मंजिल होगा
उठ जाओ रोना बंद करो, रोने से क्या हासिल होगा।

स्वच्छ और स्वस्थ दुनिया का स्वयं नक्शा बदल डाला..


स्वच्छ और स्वस्थ दुनिया का स्वयं नक्शा बदल डाला
हमारे लोभ आलस ने, प्रकृति का नाश कर डाला।

हर एक जीवन, वृक्ष भोजन, प्राण ऊर्जा का संवाहक
प्रमुखतम तत्व जीवन का, कृत्रिम अनुपलब्ध जो अब तक
सिमटते भू जलाशय की, चेतावनी जानकर भी क्यों
तरल जीवन इकाई को, सरलता से बहा डाला

हवन सामग्री, धूप दीपक, मूर्ति प्रसाद पुष्प माला
बचा पूजन मे जो, वो पूज्य नदियों मे चढ़ा डाला
बहा अवशिष्ट शहरों का, घरों का कारखानों का
अविरल साफ धारा को, कर दिया संकुचित नाला

हवा मे प्राणवायु का, निरन्तर गिर रहा स्तर
धुआं हैं धूल है अपने, सुबह का शाम का सहचर
बदल ईंधन को धुएं मे, हवा को कर दिया काला
कवर हर एक चेहरे पे, व्यक्ति रोगी बना डाला

खेत को भी, बगीचे को भी, हमने कर दिया दूषित
रासायन के प्रयोगो से, फसल को कर रहे विकसित
जहर भर के फलों मे, दूध सब्जी मे अनाजों मे
मनष्यो ने मनुष्यों को, बहुत बीमार कर डाला

प्रचंड मौसम हवा बारिश, प्रकृति चेतावनी जैसे
समय है शेष, परिवर्तित करें जीवन के हर हिस्से
नहीं की कद्र इसकी जो, मिला उपहार मे हमकों
हमारे वंशजों को बस मिलेगा, रोग विष ज्वाला

करें नदियों को गंदा, बहाये व्यर्थ मे जल
लगायें पेड़ पौधों को, बचायें ऊर्जा हर पल
जो हो उद्देश्य सबका ही, धरा को सींचने वाला
ये माँ ऐसे ही पालेगी, जिस तरह आज तक पाला

Few Serious Thoughts


जो लिखा मस्तिष्क मन ने, व्यक्त वाणी ने किया,
वो मेरी क्षमता नहीं, माँ शारदा आशीष हैं ।।(FB)

समय की घोर कालिख को, चमक का अंत मत समझो,
वो गहरी खान मे कोयले की,हीरे को छुपाता है।।

बहुत नायाब है, खुद दौडकर मंजिल पंहुच जाना,
किसी का साथ दे, मंजिल तक पंहुचाना करिश्मा है।।

दिलों के भी समंदर मे, कभी तूफान हैं जायज,
खलिश बाहर निकली तो, कत्ल बन गांठ कर देगी।।

कहें हम क्या खता तेरी, सुने तेरी शिकायत क्या,
चलो मिल ले गले जी भर, ये दिल खुद ही निपट लेंगे।।

बनायीं हैं कई ऊँची, ईमारत अपने हाथों से,
मगर कोना भी उस जैसा, नहीं अपना बना पाया।।
खिलायें हैं निवालें खूब, पेट भर भर के दुनियां को,
मगर हर रोज भर के पेट अपना सो नहीं पाया ।।(FB)

नहीं आवाज कुछ करतीं, टंगी रहतीं है कीलों पें
सुनो खामोश दिल से तो, बहुत कुछ बोलती हैं यें

फर्क आबाद और बर्बाद में, न रह गया काफी, 
ये है बर्बाद आबादी,या है आबाद बर्बादी ।।(FB)

हटा दो शब्द को पीछे, लगा दो पंक्ति को नीचे,
किसी की मूल रचना को स्वरचित काव्य हैंं कहते ।
कभी शैली कभी मुक्तक, कभी शब्दों की गहराई,
चुराकर काव्य, सम्मानित कवि ये हो नहीं सकते ।।(FB)


पडोसी है मेरा फिर भी वो मुझसे रंज रखता है,
मेरी हर हार पे खुशियाँ मनाता तंज कसता है,
मेरा दुश्मन है फिर भी मानता है उसके लोहे को,

दबे मुँह मेरे चौकीदार की तारीफ करता है ।।(FB)

मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ...


मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ

हर गांव गली मोहल्ले मे, कई घरों कई दीवारों पे,
हर मोड़ सडक चौराहे पे, कुछ बसों पे और कुछ कारों पे,
हर ओर लगे विज्ञापन पर, जब जब मैं नजर टिकाता हूँ,
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

हर मुख्य पृष्ठ हर बैक कवर, हर पेज के कोने कोने पर,
विज्ञापन से भरी पत्रिका, और अखबार के होने पर,
मै बिना प्रश्न जब जब इनपर, अपना कुछ मूल्य गंवाता हूँ
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

हर मनोरंजन के साधन मे, व्यवधान निरंतर रहता है,
खेल फिल्म गाने खबरें, विज्ञापन से कम लगता हैं
जब FM या TV चैनल के मै एड ब्रेक्स सह जाता हूँ,
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

हर वाँल पेज या एप कोई, इनसे रहा अछूता हैं
यूट्यूब वीडियो भी आखिर, चलते चलते कुछ रूकता हैं,
जब इंटरनेट की दुनिया मे, कोई पाँप लिंक दबाता हूँ
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

हर सभा गोष्ठी सम्मेलन मे, हर सार्वजनिक आयोजन मे
हर छोटे बडे समारोहों के, प्रायोजक के प्रयोजन मे
हर बात के आगे पीछे जब, एक नाम लगा मैं पाता हूँ
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

हर व्यवसायिक केन्द्र ही बस, अब नहीं रहा खरीदार मेरा,
हर नेता दल और सरकारें भी करती हैं व्यापार मेरा
जब युवा सोच और अच्छे दिन का हिस्सा मैं बन जाता हूँ
मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ, मैं थोड़ा सा बिक जाता हूँ।।

Dashrath Manjhi


वो हनुमान या कृष्ण नहीं, जो पर्वत मूल उठाया था,
वो था साधारण निर्बल पर, पर्वत को धूल चटाया था
वो नहीं शहशांह था प्रेमी, जो उँचा महल बनाया था,
वो था निर्धन प्रेमी पागल, एक उँचा शैल गिराया था ।।

जिसनें पत्नी को छीना था, कुछ दूरी थी कुछ उँचाई,
उस व्यथित हृदय ने ठान लिया, अब दूर करु जग कठिनाई
ज्यों सतीदाह पे क्रोधी शिव ने, तीनों लोक हिलाया था,
उस मानस ने पत्नी मृत्यु का, कारण मूल मिटाया था।। It

कितनी मुश्किल कितना अभाव, कितना उपहास सहा होगा,
कितना स्थिर कितना विचलित, वो मानव हृदय रहा होगा
हर मौसम हर बिमारी में, वो पर्वत  जैसा डटा रहा,
भूधर को भूतल करने में , बाईस वर्षो तक जुटा रहा

साधन थे साथी थे, बस छैनी और हथौड़ा था,
बाईस वर्षों की चोटों ने, पर्वत का सीना तोड़ा था
सालों की छोटी खटखट ने, सदियों का शूल मिटाया था,
मानव क्षमता का नया सूर्य, एक मानव ने दिखलाया था  ।।