Friday, 5 October 2018

Few Serious Thoughts


जो लिखा मस्तिष्क मन ने, व्यक्त वाणी ने किया,
वो मेरी क्षमता नहीं, माँ शारदा आशीष हैं ।।

समय की घोर कालिख को, चमक का अंत मत समझो,
वो गहरी खान मे कोयले की,हीरे को छुपाता है।।

बहुत नायाब है, खुद दौडकर मंजिल पंहुच जाना,
किसी का साथ दे, मंजिल तक पंहुचाना करिश्मा है।।

दिलों के भी समंदर मे, कभी तूफान हैं जायज,
खलिश बाहर निकली तो, कत्ल बन गांठ कर देगी।।

कहें हम क्या खता तेरी, सुने तेरी शिकायत क्या,
चलो मिल ले गले जी भर, ये दिल खुद ही निपट लेंगे।।

बनायीं हैं कई ऊँची, ईमारत अपने हाथों से,
मगर कोना भी उस जैसा, नहीं अपना बना पाया।।
खिलायें हैं निवालें खूब, पेट भर भर के दुनियां को,
मगर हर रोज भर के पेट अपना सो नहीं पाया ।।

नहीं आवाज कुछ करतीं, टंगी रहतीं है कीलों पें
सुनो खामोश दिल से तो, बहुत कुछ बोलती हैं यें

फर्क आबाद और बर्बाद में, न रह गया काफी, 
ये है बर्बाद आबादी,या है आबाद बर्बादी ।।

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